- आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख ने कहा- एकता के धर्म से जुड़ा है भारत
- विश्वविद्यालय के विकास में छात्रों की सहमति अनिवार्य है : प्रो. विनय कुमार पाठक
कानपुर, 25 अगस्त (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष पर 'युवा संवाद' कार्यक्रम में मंगलवार को आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने युवाओं को संबोधित हुए कहा कि पूरी दुनिया आज प्रगति की ओर अग्रसर भारत को एक नए नजरिए से देख रही है। ऐसे में देश के युवाओं का यह दायित्व बनता है कि वे आगे आएं और देश को अधिक समृद्ध, सशक्त एवं स्वाभिमानी बनाने में अपना योगदान दें।
उन्होंने संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को याद करते हुए बताया कि इसकी नींव देशभक्ति और देश की स्वाधीनता के मूल उद्देश्यों पर रखी गई है। उन्होंने बताया कि देश सिर्फ राजनीति से नहीं ब्लकि एकता धर्म से जुड़ा हुआ है। भारत की महानता का जिक्र करते हुए कहा कि कई दुनिया के देश हैं, जिन्होंने ऐसे काम किए जिसके लिए आज भी माफी मांगनी पड़ती है। परंतु भारत एक ऐसा देश है कि हमारे पूर्वजों ने कोई ऐसा काम नहीं किया जिसके कारण दुनिया के किसी कोने में जाकर हमको माफी मांगनी पड़े।
छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई सभागार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर 'युवा संवाद' कार्यक्रम आयोजित हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि विचारक एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने युवाओं से सीधे संवाद किया। नई पीढ़ी की सोच, आकांक्षाओं, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा हुई। युवाओं ने भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, शिक्षा एवं रोजगार, सोशल मीडिया, महिला सुरक्षा और राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर प्रश्न पूछे।
प्रश्न: आपके अनुसार सांस्कृतिक मूल्यों को कैसे अपनाया जाए कि सांस्कृतिक परंपराएं व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधा न बनें?
उत्तर: सुनील आंबेकर : व्यक्तिगत स्वतंत्रता मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, लेकिन समस्या तब आती है जब एक व्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरे की स्वतंत्रता में बाधा बनने लगे। भारतीय सांस्कृतिक मूल्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता को रोकते नहीं, बल्कि सभी की स्वतंत्रता और सम्मान को सुरक्षित रखने में मदद करते हैं। आपसी सम्मान, संबंधों की समझ, त्याग, समर्पण और सेवा जैसे मूल्य समाज में स्वतंत्रता और सामंजस्य कर सकते हैं।
प्रश्न: संघ और अन्य सामाजिक संगठन शिक्षा और रोजगार क्षमता में सुधार करने में क्या भूमिका निभा सकते हैं?
उत्तर: आंबेकर: विभिन्न सामाजिक संगठनों के माध्यम से शिक्षा, सेवा और रोजगार से जुड़े अनेक प्रकल्प चलाए जा रहे हैं। एकल विद्यालय जैसे प्रयासों किए गए हैं जहां स्कूल उपलब्ध नहीं हैं, वहां शिक्षा पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके साथ ही युवाओं को प्रशिक्षण, मार्गदर्शन, उद्यमिता और उद्योगों से जोड़ने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।
प्रश्न: आज के कॉलेज विद्यार्थियों को ऐसे कौन-से कोर्स और कौशल सीखने चाहिए, जो भविष्य में प्रासंगिक रहें?
उत्तर:आंबेकर: विद्यार्थियों को अपनी मुख्य पढ़ाई के साथ दो-चार अतिरिक्त कौशल जरूर सीखने चाहिए। AI और कंप्यूटर जैसी आधुनिक तकनीकी दक्षताओं के साथ व्यावहारिक और हैंड्स-ऑन स्किल्स भी जरूरी हैं। कोई भी कौशल छोटा या बड़ा नहीं होता। विद्यार्थियों को अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार कौशल विकसित करके उसमें बेहतर बनने का प्रयास करना चाहिए।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर विनय कुमार पाठक ने कहा शिक्षण संस्थानों में केवल आदेश (डिक्टेशन) देने की संस्कृति नहीं होनी चाहिए, बल्कि छात्रों के साथ मिलकर आम सहमति (कंसेंसस) और सार्थक चर्चा (डिस्कशन) को बढ़ावा मिलना चाहिए। सभी निर्णयों में युवाओं की सहभागिता सुनिश्चित की जाए। अपने संघ से जुड़ाव को याद करते हुए बताया कि किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए व्यक्ति को केवल बाहरी तौर पर नहीं बल्कि आंतरिक रूप से भी तैयार और जागरूक होना पड़ता है। उन्होंने युवाओं को विचारक बनने के लिए प्रोत्साहित करते हुए कहा कि विचार करने से ही भारत महान बना है यहां ऐसे साधु संत विचारक हैं जो हर क्षण जो यह सोचते हैं कि वह देश के लिए क्या कर सकते हैं इसी के साथ उन्होंने युवाओं को भी नई दिशा की ओर बढ़ने के लिए आह्वान किया।





